Let it be

Regret has settled into my abyss
Broken is how I feel today
It’s been a few long weeks of gloom
And it looks like this phase is here to stay

I roam the streets with an open wound
And sometimes someone heals it up
It helps me mend my broken heart
And it temporarily fills up my empty cup

I am the gap I hope to fill
But I don’t feel I have it left in me
To heal myself and stand back up
So I give up, and just let it be.

Perhaps someday I will find the strength
To reclaim what is meant to be
Perhaps someday I will fill my cup
With courage that is somewhere hidden in me.

गुमसुम

I looked at the bougainvillea from my kitchen window. I bought it towards the end of last summer, finally got to planting it in fall, and then it was soon bare. Not a single leaf survived. Yet, it bounced back this spring. Back to its glory. The poem was born this morning, as I looked at the bougainvillea and my messy yet colorful living room. I bounced back from several set backs this week. Just like the bougainvillea.

वो भी दिन थे, और यह भी दिन हैं 
और बीच में कहीं गुमसुम हम हैं 
वो भी दिन थे 
जब पेढ़ों पे पत्ते नहीं दिखाई देते थे!
और आज उन्ही शाखाओं पर गुलाबी फूल मुस्कुराते हैं 
वो भी दिन थे जब घर ख़ामोश था और आँगन वीरान था। 
और आज खिलखिलाती हँसी और छोटे छोटे पैरों का शोर 
सारा दिन दिल लगाए रखता है
वो भी दिन थे जब रातें लम्बी थी 
और सुबह का कोई निशान नहीं था 
और यहाँ आजकल किस्से कहानियों के चक्कर में, दिन छोटे पढ़ जाते हैं
वक़्त ना ही वो रुका था, ना ही यह थमेगा 
यह कारवाँ तो ऐसे ही चलता रहेगा 
और हम इस कारवाँ के मुसाफ़िर, यूँ ही हर मोड़ पर संभलते रहेंगे।
वो भी दिन थे, और यह भी दिन हैं 
और बीच में कहीं गुमसुम हम हैं 

तारा और मैं

क्या करें कि यह दिल घबराता है

इस सोच से ही सहम जाता है

कैसे समझें इस कश्मकश को

तुम्हारी फ़िकर रहती है हर वक़्त, और तुम्हारी प्यारी  बातों से दिल बहल जाता है

कैसा रिश्ता है यह समझने में भी डर लगता है

तुम्हारे साथ गुज़रा हुआ हर लम्हा मुस्कुराता है

याद आती है वो तनी हुई आँखें

और वो थोड़ा सा ग़ुस्सा जो मेरी हँसी में डूब जाता है

नज़रें ऐसी मिलती हैं जैसे समंदर और लहरें

इतनी गहरी की नज़र हटाने का मन नहीं करता

तुमसे बहुत कुछ समझने और तुमको बहुत कुछ समझाने का मन करता है

अपने प्यार में पिघालने का मन करता है

तुम्हारे साथ गुफ़्तगू करने का मन करता है

कुछ कहने और बहुत कुछ सुनने का मन करता है

तुम्हारी आवाज़ में जैसे लहरें की गहराई सुनाई पढ़ती है

तुम्हारी हँसी में नादानी और चाल में लचक दिखाई देती है

मालूम है मुझे कि एक दिन यह लमहें जो तुम मेरे साथ बिताती हो, यह जो हँसी के ठहाके जो तुम मेरे साथ लगाती हो

उनमें मेरी कोई गुंजाइश नहीं होगी

बढ़ी हो जाओगी तुम तारा, और अपनी ज़िन्दगी कि उधेढ़ बुन में मश्रूफ हो जाओगी

यह तुम्हारी बचपन की यादें तभी मेरे काम आएँगी, यही तो मेरे मायूस दिल को बरसों तक लुभायेंगीं

यह सब सोच के यह दिल घबराता है

और इन ख़यालों में उलझ जाता है

हर वक़्त तुम्हारी फ़िकर रहती है

और तुम्हारे साथ बीता हुआ हर लम्हा एक प्यारी सी याद बनके ठहर जाता है ।

tear drop

A tear drop holding still at the brim, 

Creating a blurr, and a stir within

Beckons a hope that is far and forlorn

Kindles a desire, yet to be born


Don’t blink, hold still, or the tear will roll

Causing a stream, crushing the soul

Don’t shush the silence, let it speak a little more

The fear is faultless, and intentions are pure


This tear drop holds a memory within

If I let it fall, will I give in?

I lean on to the memory, and let the drop recede

Rolling it back, I crush the need

धुंधली सुबह

कोहरे में लिपटी थी आज की सुबह

यकीनन ऐसा लगा जैसे कोई  ख्वाब देख रही हूँ मैं

दूर दूर तक एक सफ़ेद चादर बिछी थी

सूरज का भी आज उठने का इरादा नहीं था


दूर से गाड़ियों  की टिमटिमाती बत्तियां देखि तो ऐसा लगा,

जैसे तारे ज़मीन पर एक सीधी लकीर में बिखरे हों

माहौल चाहे  गुम सुम और थोड़ा संगीन था लेकिन

रंगो की कमी बिलकुल मेहसूस  नहीं हो रही थी


नीला, सुरमई, भूरा और धुँधला था सब कुछ

जैसे किसी ने एक ही कूंचे में पूरी तस्वीर बना दी हो

आसमान आज तफ्सील का मौहताज नहीं था

और हवा का जूनून भी ज़ाहिर नहीं था


चंद मासूम ख़यालों में मसरूफ थी आज की सुबह

धुँधली आँखें थी या धुंधला था समां, किसे मालूम

खुली आँखों से अगर कुछ ख्वाब देख भी लिए तो क्या 

आखिर अपनी इस लियाक़त का हमें इल्म तो हुआ 🙂

A cup of tea

As I rolled up the blinds, it was foggy outside

The streets were empty, and the leaves were still

Some still yellow, and some brown, and some holding on to their green

The birds were also hiding, not wanting to be seen.


I put the water to boil

And watched the bubbles come to the surface

In a blink of an eye I was by the ocean, my feet covered in foam

Waves crashing against a rock, and then returning home.


I have a strange relationship with the ocean

It answers all my questions, of which I have plenty

And gives me a measure of my happiness and sadness

And from time to time a friend, in whom I can confess


I added a spoon full of tea leaves, and watch them swirl and let go

Soon water became tea, and energy was sucked out of the leaves

I feel like that sometimes, exhausted and drained

But today I just sat down, and looked upon the freshly brewed tea,

Trying not to think of the leaves that had just been strained.

Drifting by

Most of the time I feel -

Like a wild flower in a garden

Like a smeared mascara on a well done face

Like a rogue child, in a well synchronized orchestra

Like an anomaly

Like a character from Murakami's book

Like a fool

like a poem, gone wrong


And sometimes I feel -

like an oasis in a desert

like a lovesong

like sunshine in a storm


And then at times -

like an incomplete book

like a grey sky

like a road that is under construction

like a memory left to die


Moment to moment - figuring out my place under this blue sky

Finding meaning, spreading joy, healing wounds and watching this life just drifting by.

Like a rain drop that falls and blends in with the rain

I race back into the crowds and try to forget my pain